हम वो नहीं थे जो बन गए इन कातिल नज़रों के ईशारों में
बातें करती हैं पलकें तुम्हारी अल्फ़ाज़ों की ख़ामोशी में.…
देखते ही जब दिल ने चुन लिया था तुम्हे हज़ारों में
ऐ काश ! बस तभी थम जाते, उलझे नही होते यूँ जज़बातों में.…
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मोह्हबत नही, हम तुमसे नफरत की फ़रियाद करते हैं ……
कुछ इसी बहाने से , वो हमें याद तो करते हैं
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हर शायर मोह्हबत का मारा नही होता ,
ये तो ज़ालिम दुनिया है.… जिसने इश्क़ को बदनाम किया हुआ है
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आँखें बंद करने से तुम सच्चाई झुटला नही सकते ,
तकदीर का लिखा वक़्त से कभी चुरा नही सकते …
चाहे जितना घिस लो इन हाथों को पत्थरों से ,
लकीरों के निशान कभी मिटा नही सकते....
-- श्वेतिमा
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